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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रिवः) हे अन्नवाले ! [वा वज्रवाले परमेश्वर !] (त्वा) तुझको (स्तोमाः) स्तुति करनेवाले लोग (उत्) अच्छे प्रकार (मदन्तु) प्रसन्न करें, तू [हमारे लिये] (राधः) धन (कृणुष्व) कर, (ब्रह्मद्विषः) वेदद्वेषियों को (अव जहि) नष्ट कर दे ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा के गुणों को जानकर विद्याधन और सुवर्ण आदि धन बढ़ावें और अधर्मियों का नाश करें ॥१॥
टिप्पणी: मन्त्र १-३ ऋग्वेद में है-८।६४ [सायणभाष्य ३], १-३ और कुछ भेद से सामवेद में हैं-उ० ६।१। तृच ३ और मन्त्र १ साम०-पू० ३।१।१ ॥ १−(उत्) उत्तमतया (त्वा) (मदन्तु) तर्पयन्तु (स्तोमाः) स्तावकाः (कृणुष्व) कुरु (राधः) विद्यासुवर्णादिधनम् (अद्रिवः) अदिशदिभूशुभिभ्यः क्रिन्। उ० ४।६। अद भक्षणे-क्रिन्। हे अन्नवन्। वज्रिन् (अव जहि) विनाशय (ब्रह्मद्विषः) वेदद्वेष्टॄन् ॥
