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देवता: इन्द्रः ऋषि: प्रगाथः छन्द: गायत्री स्वर: सूक्त-९३

उत्त्वा॑ मन्दन्तु॒ स्तोमाः॑ कृणु॒ष्व राधो॑ अद्रिवः। अव॑ ब्रह्म॒द्विषो॑ जहि ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत् । त्वा । मन्दन्तु । स्तोमा: । कृणुष्व । राध: । अद्रिव: ॥ अव । ब्रह्मऽद्विष: । जहि ॥९३.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:93» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर की उपासना का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अद्रिवः) हे अन्नवाले ! [वा वज्रवाले परमेश्वर !] (त्वा) तुझको (स्तोमाः) स्तुति करनेवाले लोग (उत्) अच्छे प्रकार (मदन्तु) प्रसन्न करें, तू [हमारे लिये] (राधः) धन (कृणुष्व) कर, (ब्रह्मद्विषः) वेदद्वेषियों को (अव जहि) नष्ट कर दे ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा के गुणों को जानकर विद्याधन और सुवर्ण आदि धन बढ़ावें और अधर्मियों का नाश करें ॥१॥
टिप्पणी: मन्त्र १-३ ऋग्वेद में है-८।६४ [सायणभाष्य ३], १-३ और कुछ भेद से सामवेद में हैं-उ० ६।१। तृच ३ और मन्त्र १ साम०-पू० ३।१।१ ॥ १−(उत्) उत्तमतया (त्वा) (मदन्तु) तर्पयन्तु (स्तोमाः) स्तावकाः (कृणुष्व) कुरु (राधः) विद्यासुवर्णादिधनम् (अद्रिवः) अदिशदिभूशुभिभ्यः क्रिन्। उ० ४।६। अद भक्षणे-क्रिन्। हे अन्नवन्। वज्रिन् (अव जहि) विनाशय (ब्रह्मद्विषः) वेदद्वेष्टॄन् ॥