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देवता: इन्द्रः ऋषि: पुरुहन्मा छन्द: प्रगाथः स्वर: सूक्त-९२

आ प॑प्राथ महि॒ना वृष्ण्या॑ वृष॒न्विश्वा॑ शविष्ठ॒ शव॑सा। अ॒स्माँ अ॑व मघव॒न्गोम॑ति व्र॒जे वज्रि॑ञ्चि॒त्राभि॑रू॒तिभिः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । पप्राथ । महिना । वृष्ण्या । वृषन् । विश्वा । शविष्ठ । शवसा ॥ अस्मान् । अव । मघऽवन् । गोऽमति । व्रजे । वज्रिन् । चित्राभि: । ऊतिऽभि: ॥९२.२१॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:92» पर्यायः:0» मन्त्र:21


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

मन्त्र ४-२१ परमात्मा के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषन्) हे शूर ! (शविष्ठ) हे अत्यन्त बली ! [परमात्मन्] (महिना) अपने बड़े (शवसा) बल से (विश्वा) सब (वृष्ण्या) शूर के योग्य बलों को (आ) सब ओर से (पप्राथ) तूने भर दिया है। (मघवन्) हे महाधनी ! (वज्रिन्) हे दण्डधारी ! [शासक परमेश्वर] (गोमति) उत्तम विद्यावाले (व्रजे) मार्ग में (चित्राभिः) विचित्र (ऊतिभिः) रक्षाओं से (अस्मान्) हमें (अव) बचा ॥२१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि परमात्मा से प्रार्थना करके सब पदार्थों से उपकार लेकर यथावत् पालन करें ॥२१॥
टिप्पणी: मन्त्र २०, २१ आचुके हैं-अ० २०।८१।१, २ ॥ २०, २१−व्याख्यातौ-अ० २०।८१।१, २ ॥