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यद्द्याव॑ इन्द्र ते श॒तं श॒तं भूमी॑रु॒त स्युः। न त्वा॑ वज्रिन्त्स॒हस्रं॒ सूर्या॒ अनु॒ न जा॒तम॑ष्ट॒ रोद॑सी ॥
पद पाठ
यत् । द्याव: । इन्द्र । ते । शतम् । शतम् । भूमी: । उत । स्युरिति स्यु: ॥ न । त्वा । वज्रिन् । सहस्रम् । सूर्या: । अनु । न । जातम् । अष्ट । रोदसी इति ॥९२.२०॥
अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:92» पर्यायः:0» मन्त्र:20
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मन्त्र ४-२१ परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा] (यत्) जो (शतम्) सौ (द्यावः) अन्तरिक्ष [वायुलोक], (उत) और (शतम्) सौ (भूमीः) भूमिलोक (ते) तेरे [सामने] (स्युः) होवें, [न वे सब] और (न) न (सहस्रम्) सहस्र (सूर्याः) सूर्यलोक और (रोदसी) दोनों अन्तरिक्ष और भूमिलोक [मिलकर] और (न) न (जातम्) उत्पन्न हुआ जगत्, (वज्रिन्) हे दण्डधारी ! [परमात्मन्] (त्वा) तुझको (अनु) निरन्तर (अष्ट) पा सके हैं ॥१९॥
भावार्थभाषाः - सब असंख्य लोक और पदार्थ अलग-अलग होकर अथवा सब मिलकर परमात्मा की महिमा का पार नहीं पा सकते ॥२०॥
टिप्पणी: मन्त्र २०, २१ आचुके हैं-अ० २०।८१।१, २ ॥ २०, २१−व्याख्यातौ-अ० २०।८१।१, २ ॥
