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इन्द्रा या॑हि धि॒येषि॒तो विप्र॑जुतः सु॒ताव॑तः। उप॒ ब्रह्मा॑णि वा॒घतः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र । आ । याहि । धिया । इषित: । विप्रऽजूत: । सुतऽवत: ॥ उप । ब्रह्माणि । वाघत: ॥८४.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:84» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सभापति के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले सभापति] (धिया) कर्म से (इषितः) बढ़ाया गया, और (विप्रजूतः) बुद्धिमानों से वेगवान् किया गया तू (सुतावतः) सिद्ध किये हुए तत्त्वरस वाले (वाघतः) बुद्धिमान् पुरुषों को और (ब्रह्माणि) धनों को (उप=उपेत्य) प्राप्त होकर (आ याहि) आ ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य को चाहिये कि अपने उत्तम कर्म और विद्वानों की शिक्षा से विज्ञानी बुद्धिमानों के साथ धन की वृद्धि करे ॥२॥
टिप्पणी: २−(इन्द्र) (आ याहि) (धिया) कर्मणा-निघ० २।१। (इषितः) प्रेरितः (विप्रजूतः) जू इति सौत्रो धातुः गतौ-क्त। मेधाविभिः प्रेरिते वेगयुक्तः कृतः (सुतावतः) निष्पादिततत्त्वरसयुक्तान् (उप) उपेत्य (ब्रह्माणि) धनानि (वाघतः) आ० २०।१९।२। मेधाविनः पुरुषान्-निघ० ३।१ ॥