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क॒विर्न नि॒ण्यं वि॒दथा॑नि॒ साध॒न्वृषा॒ यत्सेकं॑ विपिपा॒नो अर्चा॑त्। दि॒व इ॒त्था जी॑जनत्स॒प्त का॒रूनह्ना॑ चिच्चक्रुर्व॒युना॑ गृ॒णन्तः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

कवि: । न । निण्यम् । विदथानि । साधन् । वृषा । यत् । सेकम् । विऽपिपान: । अर्चात् ॥ दिव: । इत्था । जीजनत् । सप्त । कारून् । अह्ना । चित् । चक्रु । वयुना । गृणन्त: ॥७७.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:77» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (कविः न) जैसे बुद्धिमान् पुरुष (विदथानि) जानने योग्य कर्मों को (साधन्) सिद्ध करता हुआ (निण्यम्) गूढ़ अर्थ को, [वैसे ही] (यत्) जो (वृषा) सुखों का बरसानेवाला बलवान् [राजा] (सेकम्) सिञ्चन [वृद्धि के प्रयत्न] को (विपिपानः) विशेष करके रक्षा करता हुआ (अर्चात्) सत्कार करे, वह (इत्था) इस प्रकार से (सप्त) सात (चारून्) काम करनेवालों [अर्थात् त्वचा, नेत्र, कान, जिह्वा, नाक, मन और बुद्धि, अथवा दो कान, दो नथने, दो आँख और एक मुख, इन सात] को (दिवः) व्यवहारकुशल (जीजनत्) उत्पन्न करे, (चित्) जैसे (गृणन्तः) उपदेश करते हुए पुरुषों ने (अह्ना) दिन के साथ (वयुनानि) जानने योग्य कर्मों को (चक्रुः) किया है ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो राजा बुद्धिमानों के समान गूढ़ विचारवाला और वृद्धि करनेवाला होता है, वह सबके शरीर और बुद्धि को व्यवहारकुशल करके पहिले महात्माओं के सदृश अद्भुत कर्मों को दिन के प्रकाश के समान प्रकट करता है ॥३॥
टिप्पणी: मन्त्र में (कारु) पद ऋषि आदि वाचक है। यजुर्वेद ३०।। का वचन है (सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे) शरीर में सात ऋषि रक्खे हुए हैं। [सप्त ऋषयः षडिन्द्रियाणि विद्या सप्तमी] सात ऋषि छह इन्द्रियाँ और सातवीं विद्या [बुद्धि] है-निरु० १२।३७। (यः सप्त खानि वि ततर्द शीर्षणि। कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्) कर्ता ने [मनुष्य के] मस्तक में सात गोलक खोदे, यह दो कान, दोनों नथने, दोनों आँखें और एक मुख-अथ० १०।२।६ ॥ ३−(कविः) मेधावी (न) यथा (निण्यम्) अ० ९।१०।१। निर्+णीञ् प्रापणे-यक्, टिलोपो रेफलोपश्च। अन्तर्हितं गूढमर्थम् (विदथानि) ज्ञातव्यानि कर्माणि (साधन्) साधयन् (वृषा) सुखानां वर्षकः। बलिष्ठः (यत्) यः (सेकम्) सिञ्चनम्। वृद्धिप्रयत्नम् (विपिपानः) पा रक्षणे कानच्। विशेषे रक्षन् (अर्चात्) सत्कुर्यात् (दिवः) दिवु व्यवहारे-क्विप्। व्यवहारकुशलान् (इत्था) अनेन प्रकारेण (जीजनत्) लडर्थे लुङ्। अजीजनत्। जनयेत् (सप्त) सप्तसंख्यकान् (कारून्) कृवापा०। उ० १।१। करोतेः-उण्। कार्यकर्तॄन् सप्त ऋषीन्। अ० ४।११।९। सप्त होतॄन्। अ० ४।२४।३। (अह्ना) दिवसेन (चित्) यथा (चक्रुः) कृतवन्तः (वयुनानि) अ० २।२८।२। ज्ञातव्यानि कर्माणि (गृणन्तः) उपदिशन्तः ॥