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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सेनापति के लक्षण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (दस्म) हे दर्शनीय ! (उग्र) हे तेजस्वी (इन्द्र) इन्द्र ! [राजन्] (मन्यमानस्य ते) तुझ महाज्ञानी की (न) न तो (महिमानम्) महिमा को और (न) न (ते) तेरे (वीर्यम्) पराक्रम और (राधः) धन को वे [अन्य पुरुषों] (नु चित्) कभी भी (नु) किसी प्रकार (उत्) अधिकता से (अश्नुवन्ति) पहुँचते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य महिमा और विद्या आदि शुभ गुणों, पराक्रम और धन में अधिक होवे, वह सभापति राजा होवे ॥२॥
टिप्पणी: २−(नु चित्) कदापि (नु) निश्चयेन (ते) तव (मन्यमानस्य) मन ज्ञाने-शानच्। विदुषः पुरुषस्य (दस्म) अ० २०।१७।२। हे दर्शनीय (उत) आधिक्ये (अश्नुवन्ति) प्राप्नुवन्ति (महिमानम्) महत्त्वम् (उग्र) तेजस्विन् (न) निषेधे (वीर्यम्) पराक्रमम् (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त राजन् (ते) तव (न) निषेधे (राधः) धनम् ॥
