परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (नः) हमारे बीच में (उतो) निश्चय करके ही वह [जिज्ञासु पुरुष] (अस्याः) इस (उषसः) उषा [प्रभात वेला] का (जुषेत) सेवन करें और (हवीमभिः) ग्रहण करने योग्य व्यवहारों और (हवीमभिः) देने योग्य पदार्थों से (हि) ही (स्वर्षाता) सख के सेवन में (अर्कस्य) पूजनीय परमात्मा के (हविषः) ग्रहण का (बोधि) बोध करें। (यत्) क्योंकि (वज्रिन्) हे दण्डदाता (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (वृषा) सुखों का बरसानेवाला महाबलवान् तू (मृधः) हिंसक वैरियों के (हन्तवे) मारने को (चिकेतसि) जानता है, [इसलिये] (मे) मुझ (नवीयसः) अधिक नवीन [अभ्यासी ब्रह्मचारी] और (अस्य) उस (नवीयसः) अधिक स्तुतियोग्य (वेधसः) बुद्धिमान् [आचार्य] के (मन्म) मननयोग्य कथन को (आ) अच्छे प्रकार (श्रुधि) सुन ॥३॥
भावार्थभाषाः - जैसे प्रातःकाल में प्रकाश बढ़ता जाता है, वैसे ही मनुष्य उत्तम-उत्तम व्यवहारों के लेने-देने से परमात्मा की भक्ति बढ़ावें, वह जगदीश्वर विघ्ननाशक है। उसकी उपासना नवीन अभ्यासी ब्रह्मचारी और सुबोध आचार्य आदि सब लोग करते रहें ॥३॥