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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुशिप्र) हे बड़े ज्ञानी ! (विश्वचर्षणे) हे सब गतिशील मनुष्यों के स्वामी ! [वा सबके देखनेवाले परमेश्वर] (मन्दिभिः) हर्ष देनेवाले (स्तोमेभिः) स्तुतियोग्य व्यवहारों के साथ (सचा) सदा मेल से (एषु) इन (सवनेषु) ऐश्वर्यवाले पदार्थों में (आ) अच्छे प्रकार (मत्स्व) आनन्दित कर ॥९॥
भावार्थभाषाः - सर्वज्ञ सर्वदर्शक परमेश्वर के गुणों को धारण करके मनुष्य दूरदर्शी और पुरुषार्थी होकर सबको सुखी करें ॥९॥
टिप्पणी: ९−(मत्स्व) हर्षय (सुशिप्र) अ० २०।४।१। सृप्लृ गतौ-रक् सृशब्दस्य शिभावः। सृपः सर्पणादिदमपीतरत् सृपमेतस्मादेव सर्पिर्वा तैलं वा.......सुशिप्रमेतेन व्याख्यातम्-निरु० ६।१७। हे बहुज्ञानयुक्त [मन्दिभिः] म० ८। हर्षयितृभिः (स्तोमेभिः) स्तुत्यव्यवहारैः (विश्वचर्षणे) चर्षणयो मनुष्यनाम-निघ० २।३। सर्वे चरणशीला मनुष्या यस्य तत्सम्बुद्धौ। हे सर्वमनुष्यस्वामिन् ! हे सर्वदर्शक-निघ० ३।११। (सचा) समवायेन (एषु) प्रत्यक्षेषु (सवनेषु) ऐश्वर्ययुक्तेषु पदार्थेषु (आ) समन्तात् ॥
