0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर] (अस्मे) हमको (बृहत्) बढ़ता हुआ (श्रवः) सुनने योग्य धन और (सहस्रसातमम्) सहस्रों सुखों का देनेवाला (द्युम्नम्) चमकता हुआ यश और (ताः) वे [प्रसिद्ध] (रथिनी) रथों [यान विमान आदि] वाली (इषः) चलती हुई सेनाएँ (धेहि) दे ॥१४॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा की प्रार्थनापूर्वक बहुत धन, कीर्ति और सेना के संग्रह से शत्रुओं का नाश करके सुख को प्राप्त होवें ॥१४॥
टिप्पणी: १४−(अस्मे) अस्मभ्यम् (धेहि) देहि (श्रवः) श्रवणीयं धनम् (बृहत्) वर्धमानम् (द्युम्नम्) अ० ६।३।३। द्योतमानं यशः (सहस्रसातमम्) जनसनखनक्रमगमो विट्। पा० ३।२।६७। षणु दाने-विट्। विड्वनोरनुनासिकस्यात्। पा० ६।४।४१। नकारस्य आकारः, ततस्तमप्। अतिशयेन सहस्रसुखप्रदम् (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् जगदीश्वर (ताः) प्रसिद्धाः (रथिनीः) बहुयानविमानादियुक्ताः (इषः) इष गतौ-क्विप्। गतिशीलाः सेनाः ॥
