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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तुविद्युम्न) हे अत्यन्त धनवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (राये) धन के लिये (रभस्वतः) उपाय सोचकर आरम्भ करनेवाले, (यशस्वतः) यश रखनेवाले (अस्मान्) हमको (तत्र) वहाँ [श्रेष्ठ कर्म में] (सु) अच्छे प्रकार (चोदय) पहुँचा ॥१२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा में विश्वास करके पहिले से विचारकर कार्य सिद्ध करें और कीर्तिमान् होवें ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(अस्मान्) धार्मिकान् (सु) सुष्ठु (तत्र) प्रसिद्धे श्रेष्ठकर्मणि (चोदय) प्रेरय (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (राये) धनाय (रभस्वतः) रभ राभस्ये=कार्योपक्रमे-असुन्, मतुप्। उपायज्ञानपूर्वकारम्भयुक्तान् (तुविद्युम्न) बहुधनिन् (यशस्वतः) कीर्तिमतः ॥
