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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (महान्) महान् (च) और (परः) श्रेष्ठ (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला परमेश्वर] (प्रथिना) फैलाव से (द्यौः न) सूर्य के प्रकाश के समान है, (नु) इसलिये (वज्रिणे) उस महापराक्रमी [परमेश्वर] के लिये (महित्वम्) महत्व और (शवः) बल (अस्तु) होवे ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए विद्याओं द्वारा अपना ऐश्वर्य और बल बढ़ावें ॥१॥
टिप्पणी: मन्त्र १-६ ऋग्वेद में हैं-२।८।-१० और म० १-साम०-पू० २।८।२ ॥ १−(महान्) शुभगुणैः पूजनीयः (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् जगदीश्वरः (परः) उत्कृष्टः (च) (नु) अस्मात् कारणात् (महित्वम्) सर्वधातुभ्य इन्। उ० ४।१८। मह पूजायाम्-इन्, भावे त्वप्रत्ययः। महत्वम् (अस्तु) (वज्रिणे) तस्मै महापराक्रमिणे परमेश्वराय (द्यौः) सूर्यप्रकाशः (न) यथा (प्रथिना) पृथु-इमनिच्, मकारलोपः। प्रथिम्ना। विस्तारेण (शवः) बलम् ॥
