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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-९ राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (गाथिनः) गानेवालों और (अर्किणः) विचार करनेवालों ने (अर्केभिः) पूजनीय विचारों से (इन्द्रम्) सूर्य [के समान प्रतापी], (इन्द्रम्) वायु [के समान फुरतीले] (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले राजा] को और (वाणीः) वाणियों [वेदवचनों] को (इत्) निश्चय करके (बृहत्) बड़े ढंग से (अनूषत) सराहा है ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सुनीतिज्ञ प्रतापी, उद्योगी राजा के और परमेश्वर की दी हुई वेदवाणी के गुणों को विचारकर सबके सुख के लिये यथावत् उपाय करें ॥७॥
टिप्पणी: मन्त्र ७-९ आचुके हैं-अथ० २०।३८।४-६ तथा ४७।४-६ ॥ ७-९−एते मन्त्रा आगताः-अथ० २०।३८।४-६ तथा ४७।४-६ ॥
