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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-९ राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इतः) इसलिये (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े प्रतापी मनुष्य] के द्वारा (दिवः) प्रकाश से (वा) और (पार्थिवात्) पृथिवी के संयोग से (वा) और (महः) बड़े (रजसः) जल [अथवा वायुमण्डल] से (वा) निश्चय करके (सातिम्) दान [उपकार] को (अधि) अधिकारपूर्वक (ईमहे) हम माँगते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि पूर्वोक्त प्रकार से विचारपूर्वक बड़े-बड़े विद्वानों द्वारा विद्या ग्रहण करके संसार के सब अग्नि आदि पदार्थों से उपकार लेकर उन्नति करें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(इतः) अस्मात् पूर्वोक्तात् कारणात् (वा) च (सातिम्) ऊतियूतिजूतिसातिहेति० पा० ३।३।९७। षणु दाने-क्तिन्। दानम्। उपकारम् (ईमहे) ईङ् गतौ शपो लुकि श्यनभावः। याचामहे-निघ० ३।१९। (दिवः) प्रकाशात् (वा) च (पार्थिवात्) सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ। पा० ।१।४१। पृथिवी-अञ् प्रत्ययः संयोगविषये। पृथिवीसंयोगात् (अधि) अधिकारपूर्वकम् (इन्द्रम्) महाप्रतापिनं मनुष्यम् (महः) महतः (वा) अवधारणे (रजसः) उदकं रज उच्यते-निरु० ४।१९। जलात्। अन्तरिक्षात्। वायुमण्डलात् ॥
