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अ॑नव॒द्यैर॒भिद्यु॑भिर्म॒खः सह॑स्वदर्चति। ग॒णैरिन्द्र॑स्य॒ काम्यैः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अनवद्यै: । अभिद्युऽभिर: । मख: । सहस्वत् । अर्चति ॥ गणै: । इन्द्रस्य । काम्यै: ॥७०.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:70» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

१-९ राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अनवद्यैः) निर्दोष, (अभिद्युभिः) सब ओर से प्रकाशमान और (काम्यैः) प्रीति के योग्य (गणैः) गणों [प्रजागणों] के साथ (इन्द्रस्य) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले राजा] का (मखः) यज्ञ [राज्य व्यवहार] (सहस्वत्) अति दृढ़ता से (अर्चति) सत्कार पाता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - सब राज-काज उत्तम विद्वान् लोगों के मेल से अच्छे प्रकार सिद्ध होते हैं ॥४॥
टिप्पणी: ३, ४-मन्त्रौ व्याख्यातौ अथ० २०।४०।१०२ ॥