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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-९ राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे प्रजागण !] (अबिभ्युषा) निडर (इन्द्रेण) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले राजा] के साथ (हि) ही (संजग्मानः) मिलता हुआ तू (सम्) अच्छे प्रकार (दृक्षसे) दिखाई देता है। (समानवर्चसा) एक से तेज के साथ (मन्दू) तुम दोनों [राजा और प्रजा] आनन्द देनेवाले हो ॥३॥
भावार्थभाषाः - जिस राज्य में प्रजागण राजा से और राजा प्रजा से प्रसन्न रहते हैं, वही राज्य विद्या और धन में उन्नति करता है ॥३॥
टिप्पणी: मन्त्र ३, ४ आचुके हैं-अथ० २०।४०।१, २ ॥ ३, ४-मन्त्रौ व्याख्यातौ अथ० २०।४०।१०२ ॥
