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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-९ राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवयन्तः) विजय चाहनेवाले (गिरः) विद्वान् लोगों ने (यथा) जैसे (विदद्वसुम्) धनों के प्रसिद्ध करनेवाले (मतिम्) बुद्धिमान् की, [वैसे ही] (महाम्) महान् और (श्रुतम्) विख्यात पुरुष की (अच्छ) अच्छे प्रकार (अनूषत) स्तुति की है ॥२॥
भावार्थभाषाः - विजयी विद्वान् लोग अनुभवी प्रसिद्ध पुरुषों से उत्तम गुण ग्रहण करते रहें ॥२॥
टिप्पणी: २−(देवयन्तः) दिवु विजिगीषायाम्, चुरादिः-शतृ। यद्वा देव-क्यच्, शतृ। विजिगीषमाणाः। विजयमिच्छन्तः (यथा) येन प्रकारेण (मतिम्) क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्। पा० ३।३।१७४। मन ज्ञाने क्तिच्। मतयो मेधाविनाम निघ० ३।१। मेधाविनम् (अच्छ) उत्तमरीत्या (विदद्वसुम्) विद ज्ञाने-शतृ। विदन्ति जानन्ति वसूनि धनानि यस्मात् तम् (गिरः) गॄ विज्ञापे स्तुतौ च-क्विप्। विद्वांसः (महाम्) नकारतकारलोपः। महान्तम् (अनूषत) अथ० २०।१७।१। स्तुतवन्तः (श्रुतम्) विख्यातम् ॥
