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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१०-२० परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (त्वोतासः) तुझसे रक्षा किये गये (वयम्) हम (वज्रम्) वज्र [बिजुली और अग्नि के शस्त्रों] और (घना) घनों [मारने के तलवार आदि हथियारों] को (आ ददीमहि) ग्रहण करें और (युधि) युद्ध में (स्पृधः) ललकारते हुए शत्रुओं को (सम्) ठीक-ठीक (जयेम) जीतें ॥१९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा की शरण में रहकर वीर सेना और पुष्कल युद्धसामग्री लेकर शत्रुओं को हरावें ॥१९॥
टिप्पणी: १९−(इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (त्वोतासः) त्वया रक्षिताः (वयम्) धार्मिकाः (वज्रम्) विद्युदग्निशस्त्रास्त्रसमूहम् (घना) दृढानि युद्धसाधनानि लौहमुद्गरखङ्गादीनि (आ ददीमहि) गृह्णीयाम (जयेम) अभिभवेम (सम्) सम्यक् (युधि) युद्धे (स्पृधः) स्पर्ध संघर्षे-क्विप्। बहुलं छन्दसि। पा० ६।१।३४। रेफस्य सम्प्रसारणमल्लोपश्च। स्पर्धमानान्। युद्धाय शब्दमानान् शत्रून् ॥
