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नि येन॑ मुष्टिह॒त्यया॒ नि वृ॒त्रा रु॒णधा॑महै। त्वोता॑सो॒ न्यर्व॑ता ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नि । येन । मुष्टिऽहत्यया । नि । वृत्रा । रुणधामहै ॥ त्वाऽऊतास: । नि । अर्वता ॥७०.१८॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:70» पर्यायः:0» मन्त्र:18


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

१०-२० परमेश्वर की उपासना का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (येन) जिस [धन] के द्वारा (मुष्टिहत्यया) मुट्ठियों की मार [बाहुयुद्ध] से और (अर्वता) घुडचढ़े दल से (वृत्रा) शत्रुओं को (त्वोतासः) तुझसे रक्षा किये गये हम (नि) निश्चय करके (नि) नित्य (नि रुणधामहै) रोकते रहें ॥१८॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य परमेश्वर का आश्रय लेकर पुरुषार्थ के साथ विद्याओं द्वारा धन बढ़ावें और शरीर और बुद्धिबल तथा अश्व आदि सेना को दृढ़ करके शत्रुओं को जीतें ॥१७, १८॥
टिप्पणी: मन्त्र १७-२० ऋग्वेद में है-१।८।१-४ मन्त्र १७ साम०-पू० २।४। ॥ १८−(नि) निश्चयेन (येन) धनेन (मुष्टिहत्यया) हनस्त च। पा० ३।१।१०८। मुष्टि+हन हिंसागत्योः-क्यप्। मुष्टिप्रहारेण। बाहुयुद्धेन (नि) नितराम् (वृत्रा) शत्रून् (रुणधामहै) निरुणधाम। निरुद्धान् करवाम (त्वोतासः) त्वया ऊता रक्षिताः (नि) निश्चयेन (अर्वता) अश्वदलेन ॥