0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१०-२० परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर] (सानसिम्) सेवनीय, (सजित्वानम्) जीतनेवालों के साथ वर्तमान, (सदासहम्) सदा वैरियों के हरानेवाले, (वर्षिष्ठम्) अत्यन्त बढ़े हुए (रयिम्) उस धन को (ऊतये) हमारी रक्षा के लिये (आ) सब ओर से (भर) भर ॥१७॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य परमेश्वर का आश्रय लेकर पुरुषार्थ के साथ विद्याओं द्वारा धन बढ़ावें और शरीर और बुद्धिबल तथा अश्व आदि सेना को दृढ़ करके शत्रुओं को जीतें ॥१७, १८॥
टिप्पणी: मन्त्र १७-२० ऋग्वेद में है-१।८।१-४ मन्त्र १७ साम०-पू० २।४। ॥ १७−(आ) समन्तात् (इन्द्र) परमैश्वर्यवन् जगदीश्वर (सानसिम्) अ० २०।१४।२। षण संभक्तौ-असिप्रत्ययः। सेवनीयम् (रयिम्) धनम् (सजित्वानम्) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते। पा० ३।२।७। जि जये-क्वनिप्, सहस्य सभावः। जित्वभिर्जेतृभिः सह वर्तमानम् (सदासहम्) सर्वदा शत्रूणामभिभवितारम् (वर्षिष्ठम्) अ० ४।९।८। वृद्ध-इष्ठन्। अतिशयेन वृद्धम् (ऊतये) रक्षायै (भर) धर ॥
