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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१०-२० परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्यो !] (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवान् परमात्मा] को (वः) तुम्हारे लिये और (विश्वतः) सब (जनेभ्यः) प्राणियों के लिये (परि) सब प्रकार (हवामहे) हम बुलाते हैं। वह (अस्माकम्) हमारा (केवलः) सेवनीय (अस्तु) होवे ॥१६॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य सर्वहितकारी जगदीश्वर की आज्ञा में रहकर आनन्द पावें ॥१६॥
टिप्पणी: यह मन्त्र आचुका है-अ० २०।३९।१ ॥ १६−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० २०।३९।१ ॥
