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इन्द्रं॑ वो वि॒श्वत॒स्परि॒ हवा॑महे॒ जने॑भ्यः। अ॒स्माक॑मस्तु॒ केव॑लः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्रम् । व: । विश्वत: । परि । हवामहे । जनेभ्य: ॥ अस्माकम् । अस्तु । केवल: ॥७०.१६॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:70» पर्यायः:0» मन्त्र:16


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

१०-२० परमेश्वर की उपासना का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्यो !] (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवान् परमात्मा] को (वः) तुम्हारे लिये और (विश्वतः) सब (जनेभ्यः) प्राणियों के लिये (परि) सब प्रकार (हवामहे) हम बुलाते हैं। वह (अस्माकम्) हमारा (केवलः) सेवनीय (अस्तु) होवे ॥१६॥
भावार्थभाषाः - सब मनुष्य सर्वहितकारी जगदीश्वर की आज्ञा में रहकर आनन्द पावें ॥१६॥
टिप्पणी: यह मन्त्र आचुका है-अ० २०।३९।१ ॥ १६−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० २०।३९।१ ॥