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वृषा॑ यू॒थेव॒ वंस॑गः कृ॒ष्टीरि॑य॒र्त्योज॑सा। ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुतः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वृषा । यूथाऽइव । वंसग: । कृष्टी: । इयर्ति । ओजसा ॥ ईशान: । अप्रत‍िऽस्फुत: ॥७०.१४॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:70» पर्यायः:0» मन्त्र:14


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

१०-२० परमेश्वर की उपासना का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (वृषा) बलवान् बैल (यूथा इव) जैसे अपने झुण्डों को, [वैसे ही] (वंसगः) सेवनीय पदार्थों का पहुँचानेवाला, (अप्रतिष्कुतः) बे-रोक गतिवाला (ईशानः) परमेश्वर (ओजसा) अपने बल से (कृष्टीः) मनुष्यों को (इयर्ति) प्राप्त होता है ॥१४॥
भावार्थभाषाः - जैसे बलवान् बैल अपने झुण्ड को वश में रखता है, वैसे ही परमात्मा सबमें व्यापकर मनुष्य आदि प्राणियों को अपने नियम में रखता है ॥१४॥
टिप्पणी: यह मन्त्र सामवेद में भी है-उ० ८।१।२ ॥ १४−(वृषा) वीर्यवान् बलीवर्दः (यूथा) तिथपृष्ठगूथयूथप्रोथाः। उ० २।१२। यु मिश्रणामिश्रणयोः-थक्। सजातीयसमुदायान् (इव) यथा (वंसगः) अ० १८।३।३६। सेवनीयपदार्थानां प्रापयिता (कृष्टीः) अ० ३।२४।३। मनुष्यान्-निघ० २।३। (इयर्ति) ऋ गतौ-लट् शपः श्लुः। प्राप्नोति (ओजसा) बलेन (ईशानः) ईश ऐश्वर्ये-शानच्। परमेश्वरः (अप्रतिष्कुतः) म० १२। अप्रतिगतः ॥