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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१०-२० परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वयम्) हम (अर्भे) चलते हुए (महाधने) बहुत धन प्राप्त करानेवाले संग्राम में [अथवा बहुत धन में] (युजम्) सहायकारी और (वृत्रेषु) रोकनेवाले शत्रुओं पर (वज्रिणम्) वज्रधारी (इन्द्रम्) इन्द्र [परम ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर] को, (इन्द्रम्) इन्द्र [परम ऐश्वर्यवाले जगदीश्वर] को (हवामहे) बुलाते हैं ॥११॥
भावार्थभाषाः - युद्धों में तथा बहुत धन में वीर पुरुष−“हे इन्द्र जगदीश्वर ! हे इन्द्र जगदीश्वर− ऐसा स्मरण करके अपना बल बढ़ावें और प्रयत्न करके शत्रुओं को हटावें ॥११॥
टिप्पणी: यह मन्त्र सामवेद में भी है-पू० २।४।६ ॥ ११−(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं जगदीश्वरम् (वयम्) (महाधने) महाधने संग्रामनाम-निघ० २।१७। प्रभूतधननिमित्ते संग्रामे। यद्वा, महच्च तद् धनं च। प्रभूते धने (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं जगदीश्वरम् (अर्भे) अर्त्तिगॄभ्यां भन्। उ० ३।१२। ऋ गतौ-भन्। गतिशीले (हवामहे) आह्वयामहे (युजम्) युजिर् योगे, युज समाधौ च-क्विप्। सहायकम् (वृत्रेषु) आवरकेषु शत्रुषु (वज्रिणम्) दण्डधारिणम् ॥
