0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१०-२० परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले परमात्मा] (उग्रः) उग्र [प्रचण्ड] तू (वाजेषु) पराक्रमों के बीच (च) और (सहस्रप्रधनेषु) सहस्रों बड़े धनवाले व्यवहारों में (उग्राभिः) उग्र [दृढ़] (ऊतिभिः) रक्षासाधनों के साथ (नः) हमें (अव) बचा ॥१०॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की प्रार्थना करके वीर पुरुष पराक्रमी और धनी होकर प्रजा का पालन करें ॥१०॥
टिप्पणी: मन्त्र १०-१६ ऋग्वेद में है-१।७।४-१०, म० १० सामवेद-पू० ६।११।४ तथा-उ० २।१।८ ॥ १०−(इन्द्र) परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (वाजेषु) पराक्रमेषु (नः) अस्मान् (अव) रक्ष (सहस्रप्रधनेषु) असंख्यप्रकृष्टधनयुक्तेषु व्यवहारेषु (च) समुच्चये (उग्रः) प्रचण्डः (उग्राभिः) प्रचण्डाभिः। दृढाभिः (ऊतिभिः) रक्षासाधनैः ॥
