0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-९ राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [महाप्रतापी मनुष्य] (गुहा) गुहा [गुप्त स्थान] में (चित्) भी [शत्रुओं के] (वीडु) दृढ़ गढ़ को, (आरुजत्नुभिः) तोड़ डालनेवाले (वह्निभिः) अग्नियों [आग्नेय शस्त्रों] से (चित्) निश्चय करके (उस्रियाः अनु) निवास करनेवाली प्रजाओं के पीछे (अविन्दः) तूने पाया है ॥१॥
भावार्थभाषाः - प्रतापी वीर मनुष्य आग्नेय शस्त्र, बाण, तोप, भुषुण्डी आदि से गुप्त स्थानों में छिपे वैरियों को नष्ट करके प्रजा की रक्षा करें ॥१॥
टिप्पणी: मन्त्र १-६ ऋग्वेद में है-१।६।-१०, मन्त्र १ सामवेद-उ० २।२।७ ॥ १−(वीडु) वीडयतिः संस्तम्भकर्मा-निरु० ।१७। भृमृशीङ्तॄ०। उ० १।७। उप्रत्ययः। वीडु बलनाम-निघ० २।९। दृढस्थानम्। दुर्गम् (चित्) अपि (आरुजत्नुभिः) कृहनिभ्यां क्त्नुः। उ० ३।३०। आङ्+रुजो भङ्गे-क्त्नु प्रत्ययः अकारसहितः। समन्ताद् भञ्जद्भिः। सम्यग्भञ्जनशीलैः (गुहा) गुहायाम्। गुप्तस्थाने (चित्) निश्चयेन (इन्द्र) महाप्रतापिन् मनुष्य (वह्निभिः) वहिश्रिश्रु०। उ० ४।१। वह प्रापणे-नि। वोढृभिः। नेतृभिः पुरुषैः (अविन्दः) विद्लृ लाभे-लङ्। लब्धवानसि (उस्रियाः) अथ० २०।१६।७। निवासशीलाः प्रजाः (अनु) अनुलक्ष्य ॥
