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इन्द्र॑ क्रतु॒विदं॑ सु॒तं सोमं॑ हर्य पुरुष्टुत। पि॒बा वृ॑षस्व॒ तातृ॑पिम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र । क्रतुऽविदम् । सुतम् । सोमम् । हर्य । पुरुऽस्तुत ॥ पिब । आ । वृषस्व । ततृपिम् ॥७.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:7» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सेनापति के लक्षणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुष्टुत) हे बहुतों से बड़ाई किये गये (इन्द्रः) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले सेनापति] (क्रतुविदम्) बुद्धि प्राप्त करानेवाले, (तातृपिम्) तृप्त करानेवाले, (सुतम्) सिद्ध किये हुए (सोमम्) सोम [महौषधियों के रस] की (हर्य) इच्छा कर, (पिब) पी (आ) और (वृषस्व) बलवान् हो ॥४॥
भावार्थभाषाः - सेनापति बल और बुद्धि बढ़ानेवाले खान-पान के भोजन से तृप्त रहकर स्वस्थ रहे ॥४॥
टिप्पणी: यह मन्त्र आ चुका है-अ० २०।६।२ ॥ ४−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० २०।६।२ ॥