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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सेनापति के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जिस (वृत्रहा) शत्रुनाशक [सेनापति] ने (बाह्वोजसा) अपने बाहुबल से (नव नवतिम्) नौ नब्बे [९+९०=९९ अथवा ९*९०=८१०, अर्थात् असंख्य] (पुरः) दुर्गों को (बिभेद) तोड़ा है (च) और (अहिम्) सर्प [सर्पसमान हिंसक शत्रु] को (अवधीत्) मारा ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो शूर सेनापति अनेक अधर्मी दुष्टों को नाश करे, वही प्रजा को धनवान् करता है ॥२, ३॥
टिप्पणी: मन्त्र २ का मिलान करो-ऋक्० १।८४।१३ ॥ २−(यः) इन्द्रः (नव नवतिम्) नव च नवतिं च, यद्वा नवगुणितां नवतिं दशोत्तराणि अष्टाशतानि एतत्संख्याकाः। असंख्याः (पुरः) दुर्गाणि (बिभेद) भिन्नवान् (बाह्वोजसा) भुजबलेन (अहिम्) आङि श्रिहनिभ्यां ह्रस्वश्च। उ० ४।१३८। आङ्+हन हिंसागत्योः-इण् स च डित्। आहन्तारं सर्पमिव हिंसकं शत्रुम् (च) (वृत्रहा) शत्रुहन्ता (अवधीत्) हतवान् ॥
