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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-८ पराक्रमी मनुष्य के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (गिर्वणः) हे स्तुतियों से सेवनीय (इन्द्र) इन्द्र ! [महाप्रतापी मनुष्य] (आशवः) वेग गुणवाले (सोमासः) सोमरस (त्वा) तुझमें (आ) सब ओर से (विशन्तु) प्रवेश करें और (प्रचेतसे ते) तुझ दूरदर्शी के लिये (शम्) सुखदायक (सन्तु) होवें ॥॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य तीव्रबुद्धि होकर शीघ्र गुणकारी सिद्धान्तों का ग्रहण करके सुखी होवें ॥॥
टिप्पणी: −(आ) सर्वतः (त्वा) त्वाम् (विशन्तु) प्रविशन्तु। व्याप्नुवन्तु (आशवः) वेगगुणयुक्ताः (सोमासः) तत्त्वरसाः (इन्द्र) महाप्रतापिन् मनुष्य (गिर्वणः) अ० २०।६।६। स्तुतिभिः सेवनीय (शम्) सुखप्रदाः (ते) तुभ्यम् (सन्तु) (प्रचेतसे) प्रकृष्टज्ञानिने दूरदर्शिने ॥
