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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-८ पराक्रमी मनुष्य के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुक्रतो) हे श्रेष्ठ कर्म और बुद्धिवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े प्रतापी मनुष्य] (त्वम्) तू (सद्यः) शीघ्र (सुतस्य) तत्त्वरस के (पीतये) पीने के लिये और (ज्येष्ठ्याय) प्रधानपन के लिये (वृद्धः) वृद्धियुक्त पण्डित (अजायथाः) हुआ है ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य तीव्रबुद्धि होकर शीघ्र तत्त्व को ग्रहण करते हैं, वे ही संसार में बड़े पद के योग्य होते हैं ॥४॥
टिप्पणी: ४−(त्वम्) (सुतस्य) निष्पादितस्य तत्त्वरसस्य (पीतये) पानाय। ग्रहणाय (सद्यः) शीघ्रम् (वृद्धः) वृद्धियुक्तः पण्डितः (अजायथाः) प्रसिद्धोऽभवः (इन्द्र) महाप्रतापिन् मनुष्य (ज्यैष्ठ्याय) गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च। पा० ।१।१२४। ज्येष्ठ-ष्यञ्। प्रधानत्वप्राप्तये (सुक्रतो) श्रेष्ठकर्मबुद्धियुक्त ॥
