0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-८ पराक्रमी मनुष्य के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुतपाव्ने) ऐश्वर्य के रक्षक मनुष्य को (वीतये) भोग के लिये (इमे) यह (सुताः) निचोड़े हुए (शुचयः) शुद्ध (दध्याशिरः) पोषक पदार्थों के यथावत् सेवन [वा परिपक्व अर्थात् दृढ़] करनेवाले (सोमासः) सोमरस [तत्त्व वा अमृतरस] (यन्ति) पहुँचते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य अपने और प्रजा के ऐश्वर्य की रक्षा कर सकता है, वही संसार में वृद्धिकारक सिद्धान्तों को दृढ़ जमाता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(सुतपाव्ने) षु ऐश्वर्ये-क्त। आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च। पा० ३।२।७४। सुत+पा रक्षणे वनिप्। ऐश्वर्याणां रक्षकाय (सुताः) निष्पादिताः (इमे) (शुचयः) पवित्राः (यन्ति) गच्छन्ति। प्राप्नुवन्ति (वीतये) वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु-क्तिन्। भोगाय (सोमासः) तत्त्वरसाः। अमृतरसाः (दध्याशिरः) आदृगमहनजनः किकिनौ लिट् च। पा० ३।२।१७१। डुधाञ् धारणपोषणयोः-किन्। दधति पुष्णन्तीति दधयः। अपस्पृधेथामानृचु०। पा० ६।१।३६। आङ्+श्रिञ् सेवायां श्रीञ् पाके वा-क्विप्, धातोः शिर् इत्यादेशः। आशीराश्रयणाद्वाश्रपणाद् वा, अथेयमितराशीराशास्तेः-निरु० ६।८। पोषकपदार्थानामाश्रयदातारः परिपक्वकर्तारो वा ॥
