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यस्य॑ सं॒स्थे न वृ॒ण्वते॒ हरी॑ स॒मत्सु॒ शत्र॑वः। तस्मा॒ इन्द्रा॑य गायत ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्य । सम्ऽस्थे । न । वृण्वते । हरी इति । समत्ऽसु । शत्रव: ॥ तस्मै । इन्द्राय । गायत ॥६९.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:69» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

१-८ पराक्रमी मनुष्य के लक्षणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (संस्थे) संस्था [न्यायव्यवस्था] में (यस्य) जिस [वीर] के (हरी) पदार्थों के पहुँचानेवाले बल और पराक्रम को (समत्सु) संग्रामों के बीच (शत्रवः) वैरी लोग (न) नहीं (वृण्वते) ढकते हैं, (तस्मै) उस (इन्द्राय) इन्द्र [महाप्रतापी मनुष्य] के लिये (गायत) तुम गान करो ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष न्यायकारी, दृढ़स्वभाव, पराक्रमी होवे, उसके गुणों को सब लोग ग्रहण करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(यस्य) पुरुषस्य (संस्थे) आतश्चोपसर्गे। पा० ३।१।१३६। सम्+ष्ठा गतिनिवृत्तौ-क। संस्थायाम्। न्यायपथव्यवस्थायाम् (न) निषेधे (वृणुते) आच्छादयन्ति (हरी) पदार्थानां हरणशीलौ बलपराक्रमौ (समत्सु) सङ्ग्रामेषु (शत्रवः) अमित्राः (तस्मै) तादृशाय (इन्द्राय) महाप्रतापिने मनुष्याय (गायत) गानं कुरुत ॥