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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-८ पराक्रमी मनुष्य के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः घ) [वही परमात्मा वा पुरुषार्थी मनुष्य] (नः) हमारे (योगे) मेल में, (सः सः) वही (राये) हमारे धन के लिये (पुरन्ध्याम्) नगरों के धारण करनेवाली बुद्धि में (आ) सब प्रकार (भुवत्) होवे। (सः) वही (वाजेभिः) अन्नों वा बलों के साथ (नः) हमको (आ गमत्) सब प्रकार प्राप्त होवे ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमात्मा की उपासना से और आप्त पुरुषार्थी विद्वानों के सत्सङ्ग से बुद्धि को उत्तम बनाकर बल और धन की वृद्धि कर ॥१॥
टिप्पणी: मन्त्र १-८ ऋग्वेद में हैं-१।।३-१०, मन्त्र १ सामवेद-उ० १।२।१० ॥ १−(सः) इन्द्रः परमेश्वरः पुरुषार्थी मनुष्यो वा (घ) एव (नः) अस्माकम् (योगे) संयोगे (आ) समन्तात् (भुवत्) आशिषि लिङि छान्दसं रूपम्। भूयात् (सः) (राये) धनलाभाय (सः) (पुरन्ध्याम्) अ० १९।१०।२। पुरां नगराणां धारिका बुद्धिः (गमत्) गमेर्लेटि शपो लुक्, अडागमः, यद्वा लिडर्थे लुङ् अडभावः। गच्छेत् प्राप्नुयात् (वाजेभिः) अन्नैर्बलैर्वा सह (आ) सर्वतः (सः) (नः) अस्मान् ॥१॥
