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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शतक्रतो) हे सैकड़ों कर्मोंवाले ! [वीर पुरुष] (अस्य) इस [तत्त्व रस] का (पीत्वा) पान करके तू (वृत्राणाम्) रोकनेवाले शत्रुओं का (घनः) मारनेवाला (अभवः) हुआ है और (वाजेषु) सङ्ग्रामों में (वाजिनम्) पराक्रमी वीर को (प्र) अच्छे प्रकार (आवः) तूने बचाया है ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो वीर पुरुष वेदविद्या का रस चखता रहता है, वह परमेश्वर की कृपा से शत्रुओं को मारकर अपने वीर लोगों की रक्षा करता है ॥८॥
टिप्पणी: ८−(अस्य) सोमस्य। तत्त्वरसस्य (पीत्वा) पानं कृत्वा (शतक्रतो) हे बहुकर्मन् (घनः) मूर्तौ घनः। पा० ३।३।७७। हन्तेरप् मूर्तिभिन्नार्थेऽपि। हन्ता। धातुकः (वृत्राणाम्) आवरकाणां शत्रूणाम् (अभवः) (प्र) प्रकर्षेण (आवः) रक्षितवानसि (वाजेषु) सङ्ग्रामेषु (वाजिनम्) पराक्रमिणं पुरुषम् ॥
