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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे इन्द्र परमेश्वर !] (आशवे) वेगवाले [रथ आदि] के लिये (यज्ञश्रियम्) यज्ञ [संगतिकरण] से लक्ष्मी बढ़ानेवाले, (नृमादनम्) मनुष्यों को आनन्द देनेवाले (आशुम्) वेग आदि गुणवाले [अग्नि, वायु आदि] पदार्थ और (ईम्) प्राप्तियोग्य जल को और (पतयत्) स्वामिपन देनेवाले, (मन्दयत्सखम्) मित्रों को आनन्द देनेवाले धन को (आ) सब प्रकार (भर) भर दे ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को उचित है कि अग्नि वायु जल आदि पदार्थों से विज्ञान द्वारा उपकार लेकर सुखी होवें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(आ) समन्तात् (ईम्) प्राप्तव्यं जलम्-निघ० १।१२। (आशुम्) कृवापा०। उ० १।१। अशूङ् व्याप्तौ-उण्। वेगादिगुणवन्तमग्निवाय्वादिपदार्थसमूहम् (आशवे) वेगादिगुणयुक्तरथादिहिताय (भर) देहि (यज्ञश्रियम्) संगतिकरणेन लक्ष्मीदातारम् (नृमादनम्) नॄणां मनुष्याणां हर्षहेतुम् (पतयत्) तत् करोति तदाचष्टे। वा० पा० ३।१।२६। पति-णिच् ततः शतृ। पतित्वसम्पादकम् (मन्दयत् सखम्) मन्दयन्तः सखायो यस्मिंस्तद्धनम् ॥
