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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (दस्म) हे दर्शनीय ! [परमात्मा] (अरिः=अरयः) प्रेरण करनेवाले [वा वैरी] (कृष्टयः) मनुष्य (उत) भी (नः) हमको (सुभगान्) बड़े ऐश्वर्यवाला (वोचेयुः) कहें, [तो भी] (इन्द्रस्य) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा] की (इत्) ही (शर्मणि) शरण में (स्याम) हम रहें ॥६॥
भावार्थभाषाः - चाहे मनुष्य ऐसे बड़े हो जावें कि बड़े-बड़े लोग और वैरी लोग भी उन्हें बड़ा जानें, तो भी वे अभिमान छोड़कर परमेश्वर की शरण में रहकर उन्नति करें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(उत) अपि च (नः) अस्मान् (सुभगान्) बह्वैश्वर्योपेतान् (अरिः) अच इः। उ० ४।१३९। ऋ गतिप्रापणयोः-इप्रत्ययः। बहुवचनस्यैकवचनम्। अरयः प्रेरकाः। नायकाः। शत्रवः (वोचेयुः) वच परिभाषणे-आशीर्लिङ् प्रथमस्य बहुवचने। लिङ्याशिष्यङ्। पा० ३।१।८६। इति विकरणस्थान्यङ् प्रत्ययः। वच उम्। पा० ७।४।२०। उमागमः। उच्यासुः। उपदिश्यासुः (दस्म) अ० २०।१७।२। हे दर्शनीय (कृष्टयः) अ० ३।२४।३। मनुष्याः (स्याम) भवेम (इत्) एव (इन्द्रस्य) परमेश्वरस्य (शर्मणि) सुखे। शरणे ॥
