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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ऐश्वर्यवान् पुरुष के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वैयश्व) हे विविध वेगवाले पुरुष ! (दशमम्) प्रकाशमान [अथवा जीवन के दसवें काल तक] (नवम्) स्तुतियोग्य [वा नवीन अर्थात् बलवान्], (सुविद्वांसम्) बड़े विद्वान् और (चरणीनाम्) चलनेवाले मनुष्यों में (चर्कृत्यम्) अत्यन्त करने योग्य कर्मों में चतुर की (एव) निश्चय करके (नूनम्) अवश्य (उप) आदर से (स्तुहि) तू स्तुति कर ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो पुरुष बड़े प्रतापी, जीवन के सौ वर्ष में से नब्बे वर्ष के ऊपर भी अर्थात् अन्त काल तक आत्मिक और शारीरिक बलवाले कर्मकुशल वीर होवें, उनके गुणों को सब मनुष्य ग्रहण करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(एव) निश्चयेन (नूनम्) अवश्यम् (उप) पूजायाम् (स्तुहि) प्रशंस (वैयश्व) वि+अश्व-अण्। न य्वाभ्यां पदान्ताभ्यां पूर्वौ तु ताभ्यामैच्। पा० ७।३।३। इति ऐकारागमः। अश्वो वेगः। हे विविधवेगवन् पुरुष (दशमम्) प्रथेरमच्। उ० ।६८। दशि भाषायां दीप्तौ च-अमच्, नकारलोपः। दीप्यमानम्। यद्वा दशानां पूरणः, डटि मुडागमः। पुरुषाणां शतायुष्यनियमात् तस्यायुषो दशधा विभागे नवत्यधिकायामवस्थायां वर्तमानम्। अतिवृद्धावस्थापर्यन्तम् (नवम्) स्तुत्यम्। नवीनं बलवन्तम् (सुविद्वांसम्) अतिशयेन ज्ञानिनम् (चर्कृत्यम्) अ० ६।९८।१। यङ्लुगन्तात् करोतेः-क्त, ततः साध्वर्थे-यत्। चर्कृतेषु अतिशयेन कर्तव्येषु कर्मसु कुशलम् (चरणीनाम्) अतिसृधृ०। उ० २।१०२। चर गतिभक्षणयोः-अनि। चर्षणीनां गमनशीलानां मनुष्याणाम् ॥
