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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) जिस [परमात्मा] के (वीर्या) वीर कर्म (अमितानि) बे-नाप हैं, [जिसका] (राधः) धन (पर्येतवे) पार पाने योग्य (न) नहीं है, और [जिसकी] (दक्षिणा) दक्षिणा [दानशक्ति], (ज्योतिः न) प्रकाश के समान (विश्वम् अभि) सब पर फैलकर (अस्ति) वर्तमान है ॥३॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम परमेश्वर की स्तुति नम्रतापूर्वक करके अपना सामर्थ्य बढ़ाओ, वह जगदीश्वर अनन्त बली, अनन्त धनी और अनन्त दानी है ॥२, ३॥
टिप्पणी: ३−(यस्य) इन्द्रस्य। परमेश्वरस्य (अमितानि) परिमाणरहितानि (वीर्या) वीरकर्माणि (न) निषेधे (राधः) धनम् (पर्येतवे) इण् गतौ-तवेन्। परिगन्तुं प्राप्तुं शक्यम् (ज्योतिः) तेजः (न) यथा (विश्वम्) सर्वं जगत् (अभि) अभीत्य। व्याप्य (अस्ति) वर्तते (दक्षिणा) दानशक्तिः ॥
