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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अगोरुधाय) दृष्टि को न रोकनेवाले, (गविषे) स्तोताओं [गुणव्याख्याताओं] को चाहनेवाले, (द्युक्षाय) व्यवहारों में गतिवाले, [उस परमेश्वर] के लिये (घृतात्) घृत से (च) और (मधुनः) मधु [रस विशेष] से (स्वादीयः) अधिक स्वादु और (दस्म्यम्) दर्शनीय [विचारणीय] (वचः) वचन (वोचत) तुम बोलो ॥२॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यो ! तुम परमेश्वर की स्तुति नम्रतापूर्वक करके अपना सामर्थ्य बढ़ाओ, वह जगदीश्वर अनन्त बली, अनन्त धनी और अनन्त दानी है ॥२, ३॥
टिप्पणी: २−(अगोरुधाय) गमेर्डोः। उ० २।६७। गच्छतेर्डो, रुधिर् आवरणे-कप्रत्ययः। अदृष्टिरोधकस्य (गविषे) गो+इषु इच्छायाम्-क्विप्। गौः स्तोतृनाम-निघ० ३।१६। स्तोतॄन् इच्छवे (द्युक्षाय) अ० २०।९।२। व्यवहारेषु गतिशीलाय (दस्म्यम्) अ० २०।१७।२। दस्म-यत्। दर्शनार्हम्। विचारणीयम् (वचः) वचनम् (घृतात्) आज्यात् (स्वादीयः) स्वादुतरम् (मधुनः) रसविशेषम् (च) (वोचत) लोडर्थे लुङ्, अडभावः। ब्रूत ॥
