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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सखायः) हे मित्रो ! (नु) शीघ्र (एतो) आओ भी, (स्तोम्यम्) स्तुतियोग्य, (नरम्) नेता [प्रेरक] (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा] की (स्तवाम) हम स्तुति करें, (यः) जो (एकः) अकेला (इत्) ही (विश्वाः) सब (कृष्टीः) मनुष्यों को (अभि अस्ति) वश में रखता है ॥१॥
भावार्थभाषाः - हम सब मिलकर सर्वशक्तिमान् परमात्मा की स्तुति करके आनन्द पावें ॥१॥
टिप्पणी: मन्त्र १-३ ऋग्वेद में है-गत सूक्त से आगे, ८।२४।१९-२१। म० १ साम०-पू० ४।१०।७ ॥ १−(एतो) आ, इत उ। आगच्छतैव (नु) क्षिप्रम् (इन्द्रम्) परमेश्वरम् (स्तवाम) प्रशंसाम (सखायः) हे सुहृदः (स्तोम्यम्) स्तुतियोग्यम् (नरम्) नेतारम्। प्रेरकम् (कृष्टीः) मनुष्यप्रजाः (विश्वाः) सर्वाः (यः) (अभि अस्ति) अभिभवति। वशीकरोति (एकः) असहायः (इत्) एव ॥
