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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (हरीणाम्) दुःख हरनेवाले मनुष्यों में (स्थातः) ठहरनेवाले (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (ते) तेरी (पूर्व्यस्तुतिम्) प्राचीन बड़ाई को (नकिः) न किसी ने (शवसा) अपने बल से और (न) न (भन्दना) शुभ कर्म से (उत् आनंश) पाया है ॥॥
भावार्थभाषाः - संसार के बीच एक परमात्मा ही सर्वशक्तिमान् और सर्वदुःखनाशक है, उसीकी उपासना से मनुष्य उपकार शक्ति बढ़ावे ॥॥
टिप्पणी: −(इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (स्थातः) हे स्थितिशील (हरीणाम्) हरयो मनुष्यनाम-निघ० २।३। दुःखहर्तॄणां मनुष्याणां मध्ये (नकिः) न कश्चिदपि (ते) तव (पूर्व्यस्तुतिम्) पूर्व्यं पुराणनाम-घि० ३।२७। प्राचीनप्रशंसाम् (उत्) (आनंश) अशू व्याप्तौ-लिट्। प्राप्तवान् (शवसा) स्वबलेन (न) निषेधे (भन्दना) भदि कल्याणे सुखे च-युच्, विभक्तेराकारः। शुभकर्मणा ॥
