0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (त्वम्) तू (हि) ही [शत्रुओं की] (शश्वतीनाम्) सब (पुराम्) नगरियों का (दर्ता) तोड़नेवाला, (दस्योः) डाकू का (हन्ता) मारनेवाला और (मनोः) ज्ञानी का (वृधः) बढ़ानेवाला, (दिवः) सुख का (पतिः) स्वामी (असि) है ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सब विघ्नों को मिटाकर अपने भक्तों की उन्नति करके सुख देता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(त्वम्) (हि) एव (शश्वतीनाम्) बह्वीनाम्। सर्वासाम् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (दर्ता) विदारयिता (पुराम्) शत्रुनगरीणाम् (असि) (हन्ता) घातकः (दस्योः) परधनापहर्तुः (मनोः) मननशीलस्य। अन्यत् पूर्ववत् ॥
