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देवता: इन्द्रः ऋषि: नृमेधः छन्द: उष्णिक् स्वर: सूक्त-६४

अ॒भि हि स॑त्य सोमपा उ॒भे ब॒भूथ॒ रोद॑सी। इन्द्रासि॑ सुन्व॒तो वृ॒धः पति॑र्दि॒वः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अभि । हि । सत्य । सोमऽपा: । उभे इति । बभूथ । रोदसी इति ॥ इन्द्र । असि । सुन्वत: । वृध: । पति: । दिव: ॥६४.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:64» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमात्मा के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (सत्य) हे सत्यस्वरूप ! (सोमपाः) हे ऐश्वर्यरक्षक ! (हि) निश्चय करके (उभे) दोनों (रोदसी) सूर्य और भूमि को (अभि बभूथ) तूने वश में किया है, (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवान् परमात्मन्] तू (सुन्वतः) तत्त्वरस निचोड़नेवाले पुरुष का (वृधः) बढ़ानेवाला, (दिवः) सुख का (पतिः) स्वामी (असि) है ॥२॥
भावार्थभाषाः - सूर्य और पृथिवी आदि लोकों के रचनेवाले परमात्मा की उपासना से हम तत्त्वज्ञान प्राप्त करके वृद्धि करें ॥२॥
टिप्पणी: २−(अभि बभूथ) अभिबभूविथ। अभिभूतवानसि (हि) निश्चयेन (सत्य) हे अविनाशिस्वरूप (सोमपाः) हे ऐश्वर्यरक्षक (उभे) द्वे (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (असि) भवसि (सुन्वतः) तत्त्वरसं संस्कुर्वतः पुरुषस्य (वृधः) वर्धयिता। अन्यद् गतम् ॥