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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमात्मा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (प्रियः) प्यारा, (सत्राजित्) सत्य से जीतनेवाला, (अगोह्यः) न छिपनेवाला तू (नः) हमको (आ) सब ओर से (गधि) प्राप्त हो, तू (गिरिः न) मेह के समान (विश्वतः) सब ओर से (पृथुः) फैला हुआ, (दिवः) प्राप्तियोग्य सुख का (पतिः) स्वामी है ॥१॥
भावार्थभाषाः - सर्वहितकारी, सर्वनियन्ता, सर्वव्यापक परमात्मा की उपासना से मनुष्य आनन्द प्राप्त करें ॥१॥
टिप्पणी: मन्त्र १-३ ऋग्वेद में है-८।९८ [सायणभाष्य ८७]।४-६, सामवेद-उ० ।१। तृच १९ मन्त्र १-साम० पू० ।१।३ ॥ १−(आ) समन्तात् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् (नः) अस्मान् (गधि) गहि। गच्छ। प्राप्नुहि (प्रियः) हितकरः (सत्राजित्) सत्येन जेता (अगोह्यः) अगोपनीयः। सुप्रकटः (गिरिः) मेघः (न) इव (विश्वतः) सर्वतः (पृथुः) विस्तृतः (पतिः) स्वामी (दिवः) स्वर्गस्य। सुखस्य ॥
