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देवता: इन्द्रः ऋषि: पर्वतः छन्द: उष्णिक् स्वर: सूक्त-६३

येन॒ सिन्धुं॑ म॒हीर॒पो रथाँ॑ इव प्रचो॒दयः॑। पन्था॑मृ॒तस्य॒ यात॑वे॒ तमी॑महे ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

येन । सिन्धुम् । मही: । अप: । रथान्ऽइव । प्रऽचोदय: ॥ पन्थाम् । ऋतस्य । यातवे । तम् । ईमहे ॥६३.९॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:63» पर्यायः:0» मन्त्र:9


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

७-९ परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे जगदीश्वर !] (येन) जिस [नियम] से (सिन्धुम्) समुद्र में (महीः) भारी (अपः) जलों को (रथान् इव) रथों के समान (प्रचोदयः) तूने चलाया है, (ऋतस्य) सत्य के (पन्थाम्) मार्ग पर (यातवे) चलने के लिये (तम्) उस [नियम] को (ईमहे) हम माँगते हैं ॥९॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार नियम से परमात्मा अन्तरिक्ष और पृथिवी के समुद्र में जगत् के उपकार के लिये जल भरता और रीता करता है, वैसे ही परमेश्वर की उपासना के साथ हम नियमपूर्वक पुरुषार्थी होकर उपकार करें ॥९॥
टिप्पणी: ९−(येन) नियमेन (सिन्धुम्) अन्तरिक्षपृथिवीस्थसमुद्रं प्रति (मही) महतीः (अपः) जलानि (रथान्) (इव) यथा (प्रचोदयः) लुङि रूपम्। प्रेरितवानसि (पन्थाम्) पन्थानम् (ऋतस्य) सत्यस्य (यातवे) यातुम्। गन्तुम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥