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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
७-९ परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमात्मन् !] (येन) जिस [नियम] से (दशग्वम्) दस दिशाओं में जानेवाले, (अध्रिगुम्) बे-रोक गतिवाले, (वेपयन्तम्) [वैरियों को] कँपाते हुए, (स्वर्णरम्) सुख पहुँचानेवाले [वीर] को और (येन) जिस [नियम] से (समुद्रम्) समुद्र के समान [गम्भीर पुरुष] को (आविथ) तूने बचाया है, (तम्) उस [नियम] को (ईमहे) हम माँगते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - जो आनन्दस्वरूप जगदीश्वर पुरुषार्थियों को सदा सहाय देता है, उसीकी उपासना से पुरुषार्थ करके हम सुखी होवें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(येन) नियमेन (दशग्वम्) दश+गम्लृ गतौ-ड्वप्रत्ययः। दशदिक्षु गन्तारम् (अध्रिगुम्) अ० २०।३।१। अधृतगमनम्। अनिवारितगतिम् (वेपयन्तम्) शत्रून् कम्पयन्तम् (स्वर्णरम्) सुखस्य नेतारं प्रापयितारम् (येन) नियमेन (समुद्रम्) समुद्रमिव गम्भीरं पुरुषम् (आविथ) त्वं ररक्षिथ (तम्) नियमम् (ईमहे) याचामहे ॥
