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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (यत्) जबकि (परावतम्) दूर देश (च) और (अर्वावतम्) समीप देश के (अन्तरा) बीच में (हूयसे) तू पुकारा जाता है, (ततः) इसलिये (इह) यहाँ पर (आ गहि) तू आ ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो न्यायी राजा योग्य अधिकारियों द्वारा सब स्थान में प्रजा को पाले, सब लोग उससे प्रीति करें ॥९॥
टिप्पणी: ९−(यत्) यदा (अन्तरा) मध्ये। अन्तरान्तरेण युक्ते। पा० २।३।४। इति द्वितीया (परावतम्) दूरदेशम् (अर्वावतम्) समीपदेशम् (च) (हूयसे) आहूतो भवसि (इन्द्रः) (इह) अत्र (ततः) तस्मात् कारणात् (आ गहि) आगच्छ ॥
