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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वृत्रहन्) हे धन के पानेवाले ! (अर्वावतः) समीप देश से (च) और (परावतः) दूर देश से (नः) हममें (आ गहि) आ। और (नः) हमारी (इमाः) इन (गिरः) वाणियों का (जुषस्व) सेवन कर ॥८॥
भावार्थभाषाः - राजा धनवान् होकर समीप और दूर से प्रजा की पुकार सुनकर सदा रक्षा करे ॥८॥
टिप्पणी: इस मन्त्र का पूर्वार्ध कुछ भेद से आगे है-अ० २०।२०।४ और ७।८ ॥ ८−(अर्वावतः) अर्वाचीनात्। समीपदेशात् (नः) अस्मान् (आ गहि) आगच्छ (परावतः) दूरदेशात् (च) समुच्चये (वृत्रहन्) वृत्रं धननाम-निघ० २।१०। हन हिंसागत्योः-क्विप्। यो वृत्रं धनं हन्ति प्राप्नोति स वृत्रहा तत्सम्बुद्धौ (इमाः) उच्चार्यमाणाः (जुषस्व) सेवस्व (नः) अस्माकम् (गिरः) वाचः ॥
