पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के विषय का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (गिर्वणः) हे वाणियों से सेवनयोग्य ! (नः) हमारे (सुतम्) ऐश्वर्य की (पाहि) रक्षा कर, (मधोः) मधुर रस की (धाराभिः) धाराओं करके (अज्यसे) तू प्राप्त किया जाता है। (इन्द्रः) हे इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले राजन्] (त्वादातम्) तेरा दिया हुआ [वा शोधा हुआ] (इत्) ही (यशः) [हमारा] यश है ॥६॥
भावार्थभाषाः - प्रजागण धर्मात्मा राजा का यथायोग्य धनादि से सत्कार करके अपना ऐश्वर्य और यश बढ़ावें ॥६॥
टिप्पणी: यह मन्त्र सामवेद में भी है-पू० ३।१।२ ॥ ६−(गिर्वणः) गॄ शब्दे-क्विप्+वन संभक्तौ-असुन्। गिर्वणा देवो भवति गीर्भिरेनं वनयन्ति-निरु० ६।१४। हे गीर्भिर्वाणीभिः सेवनीय (पाहि) रक्ष (नः) अस्माकम् (सुतम्) षु ऐश्वर्ये-क्त। ऐश्वर्यम् (मधोः) मधुररसस्य (धाराभिः) प्रवाहैः (अज्यसे) प्राप्यसे (इन्द्रः) (त्वादातम्) त्वा+ददातेः क्त, छान्दसं रूपम्, यद्वा दैप् शोधने-क्त। त्वादातम्=त्वया दातव्यम्-निरु० ४।४। त्वया दत्तं शोधितं विशदीकृतं वा (इत्) एव (यशः) अस्माकं कीर्तिः ॥
