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इन्द्र॑ क्रतु॒विदं॑ सु॒तं सोमं॑ हर्य पुरुष्टुत। पिबा वृ॑षस्व॒ तातृ॑पिम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र । क्रतुऽविदम् । सुतम् । सोमम् । हर्य । पुरुऽस्तुत ॥ पिब । आ । वृषस्व । ततृपिम् ॥६.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुष्टुत) हे बहुतों से बड़ाई किये गये (इन्द्रः) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (क्रतुविदम्) बुद्धि के प्राप्त करानेवाले, (तातृपिम्) तृप्त करनेवाले, (सुतम्) सिद्ध किये हुए (सोमम्) सोम [महौषधियों के रस] की (हर्य) इच्छा कर, (पिब) पी (आ) और (वृषस्व) बलवान् हो ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा बल और बुद्धि बढ़ानेवाले खान-पान के भोजन से तृप्त होकर स्वस्थ रहे ॥२॥
टिप्पणी: यह मन्र आगे है-अ० २०।७।४ ॥ २−(इन्द्रः) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (क्रतुविदम्) प्रज्ञाप्रापकम् (सुतम्) संस्कृतम् (सोमम्) महौषधिरसम् (हर्य) कामयस्व (पुरुष्टुत) हे बहुभिः प्रशंसित (पिब) (आ) समुच्चये (वृषस्व) बलिष्ठो भव (तातृपिम्) किकिनावुत्सर्गश्छन्दसि सदादिभ्यो दर्शनात्। वा० पा० ३।२।१७१। तृप प्रीणने-किन्, सांहितिको दीर्घः। तर्पकम्। प्रीणयितारम् ॥