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इन्द्र॑ त्वा वृष॒भं व॒यं सु॒ते सोमे॑ हवामहे। स पा॑हि॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

इन्द्र । त्वा । वृषभम् । वयम् । सुते । सोमे । हवामहे । स: । पाहि । मध्व: । अन्धस: ॥६.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:6» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) हे इन्द्रः [अत्यन्त ऐश्वर्यवाले राजन्] (वृषभम्) बलिष्ठ (त्वा) तुझको (सुते) सिद्ध किये हुए (सोमे) सोम [ऐश्वर्य वा ओषधियों के समूह] में (वयम्) हम (हवामहे) बुलाते हैं। (सः) सो तू (मध्वः) मधुरगुण से युक्त (अन्धसः) अन्न की (पाहि) रक्षा कर ॥१॥
भावार्थभाषाः - प्रजाजन सत्कार के साथ ऐश्वर्य देकर धर्मात्मा राजा से अपनी रक्षा करावें, जैसे सद्वैद्य उत्तम ओषधियों से रोगी को अच्छा करता है ॥१॥
टिप्पणी: यह मन्त्र आचुका है-अ० २०।१।१। यह सूक्त ऋग्वेद में है-३।४०।१-९ ॥ १−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० २०।१।१ ॥