पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सोम रस के सेवन का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) हे इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले राजन् !] (ते) तेरे लिये (अयम्) यह (निपूतः) छाना हुआ (सोमः) सोम [महौषधियों का रस] (बर्हिषि अधि) बढ़िया आसन के ऊपर [है]। (आ इहि) तू आ, (ईम्) अब (द्रव) दौड़ और (अस्य) इसका (पिब) पान कर ॥॥
भावार्थभाषाः - उत्तम सोमरस उत्तम आसन पर वैठकर रुचि से पीना चाहिये ॥॥
टिप्पणी: यह मन्त्र सामवेद में है-पू० २।७। और मन्त्र -७ सामवेद में है-उ० १।२। तृच ॥ −(अयम्) (ते) तुभ्यम् (इन्द्रः) (सोमः) सदौषधिरसः (निपूतः) नितरां शोधितः (अधि) उपरि (बर्हिषि) प्रवृद्धासने (एहि) आगच्छ (ईम्) इदानीम् (अस्य) सोमस्य (द्रव) त्वरया आगच्छ (पिब) पानं कुरु ॥
